Thursday, January 5, 2017

Kriyapada-Kosh [ Rearranged version of Dhatupath by Dinabandhu Jha] verb roots in Maithili.

Book published under supervision of 
Pt. Bhavanath Jha, Book Publication Consultant.
Brahmi Publication Consultancy, Patna

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क्रियापद-कोश

Kriyapada-Kosh [ Rearranged version of Dhatupath by Dinabandhu Jha] verb roots in Maithili. Edited by Bhavanath Jha, 2016.     
लेखक- दीनबन्धु झा
सम्पादक       - पं. भवनाथ झा
© स्वत्व- गोविन्द झा, 104, सती चित्रकूट अपार्टमेंट, गंगापथ, पटेलनगर (पश्चिम), पटना, 800023
प्रथम संस्करण- 2016 ई.
प्रति-   200   
मूल्य- 175 (एक सय पचहत्तरि) टाका
प्रकाशक- ब्राह्मी प्रकाशन, द्वारा- भवनाथ झा  हटाढ़ रुपौली, झंझारपुर, मधुबनी, 847404
         Email: bhavanathjha@gmail.com, Phone : 9430676240

सम्पादकक दू आखर
विद्वद्वर पं श्री गोविन्द झा अपन पिताक मिथिलाभाषाधातुपाठक सम्पादन करबाक भार हमरा देलनि तँ एकहि संग गौरव, हर्ष आ विस्मय तीनू विह्नल कए देलक। पुछलिअनि, एकर सम्पादन तँ दू बेर सुचारु रूपें भए चुकल अछि, तखन हमरा की करबाक होएत? ‘रिकास्ट करबाक होएत’ -एही तीन शब्द मे स्पष्ट उत्तर भेटि गेल। अर्थात् मूल मे वर्णानुक्रम जे ककारान्त, खकारान्त इत्यादि क्रमें अछि तकरा ककारादि, खकारादि क्रमें पुनर्विन्यस्त करब। एहि नव रीतिएँ क्रमविन्यास करब तँ यन्त्र कोनहुना कए देलक परन्तु से कएला पर  बहुत रास धातु आ तकर अर्थ दोहराएल-सन लागल। जेना-
अरघ - ठोठक नीचाँ अटकब। ई औषध नहि अर्घलैन्हि वा अरघलैन्हि ....।
अर्घ - ठोठक नीचाँ अटकब। ई औषध नहि अर्घलैन्हि वा ...।
मूल मे ई भिन्न-भिन्न स्थान मे छल तें दोहराएल। एहि नव क्रम मे एहन-एहन  पुनरुक्ति हटाएब आवश्यक बुझाएल आ तकरा सुधारबाक दुःसाहस कएल। पहिल यथावत् रहए देल, दोसर मे अर्थ लिखबाक बदला पूर्ववत् ई संकेत दए देल। मूल मे दू शब्दक अर्थ छूटल छल। दूनूक अर्थ अपना मने जोड़ि देल। कतोक धातुक अर्थ तँ भिन्न-भिन्न किन्तु स्वरूप समान। एहन ठाम सुपरस्क्रिप्ट 1 आ 2 अपना मनें चढ़ाए देल अछि। 
प्रस्तुत पुस्तक मूलतः व्याकरणक परिशिष्ट छल तें  धातु तीन गण (वर्ग) मे विभक्त छल- जकादि, छकादि आ बिकादि ( मिलाउ- छकल, जाकल, बिकाएल)। एतए जकादिक संकेत (ज) आ बिकादिक (बि) राखल अछि। शेष छकादि जानल जाए। एहिना सकर्मक होएबाक संकेत एहि मे (स) राखल। शेष अकर्मक।
मूल पुस्तकक नाम छल धातुपाठ। ई नाम महावैयाकरण स्पष्टतः पाणिनि सँ लेलनि आ व्यकरणक परिशिष्ट होएबाक कारणें से उपयुक्त छल। हम एकरा नव नाम देल क्रियापद-कोश, कारण जे धातु संस्कृत व्याकरणक अवधारणा थिक। एकर अवधारणा लोक बीच लुप्त भए गेल अछि। क्रियापद-कोश संस्कृत मे तँ एक टा जनैत छी- आख्यात-चन्द्रिका, परन्तु आन भाषा मे प्रायः प्रस्तुत पुस्तक प्रथमे होएत। ओना तँ एहि मे संगृहीत लगभग सभ धातु महावैयाकरणक मिथिला-भाषाकोष मे अछिए, एकर एक प्रमुख विशेषता थिक वाक्य मे प्रयोग देखाएब। भारतीय भाषाक कतोक कोष मे प्रयोग-प्रदर्शन हाल मे चलल अछि, परन्तु महावैयाकरणक दृष्टि एकर उपयोगिता पर आइ सँ करीब सए वर्ष पूर्वहि पड़ल।
थिक तँ ई मैथिली-सँ-मैथिली द्विभाषी कोश, परन्तु एहिमे अर्थ जानि-बूझि कें प्रथमतः सार रूप मे संस्कृत शब्द सँ देल गेल अछि जाहि सँ ई केवल मैथिलक हेतु नहि, अनको हेतु उपयोगी हो। मैथिल तँ प्रयोग-प्रदर्शनहु सँ अर्थ बूझि सकैत छथि।
आनक कृति मे कोनहु प्रकारक हस्तक्षेप अपराध थिक से जनितहुँ हम ई अपराध कएल। आशा जे सुधी पाठकगण हमर ई सदाशयी अपराध क्षमा सकताह।
प्रस्तुत पुस्तक मे दू आलेख जोड़ि देल गेल अछि। पहिल थिक लक्ष्य आ उपलब्धि जे पंडितप्रवर गोविन्द झा हमर अनुरोधें अनुग्रहपूर्वक लिखि देलनि। दोसर थिक मैथिली मे युग्मनाम जे महावैयाकरण स्वयं प्राच्यविद्या-महासम्मेलनक दरभंगा अधिवेशन मे पढ़ने रहथि। ई आलेख प्रस्तुत पुस्तकक विषयक बहुत निकट अछि तें एतए परिशिष्ट रूपें समाविष्ट कए लेल गेल।
11.08.2016    भवनाथ झा


Navaranga A collection of one-act plays by Govind Jha,

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Pt. Bhavanath Jha, Book Publication Consultant.
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नवरंग (रंगमंचोपयोगी नओ गोट मैथिली नाटिकाक संग्रह)

Navaranga A collection of one-act plays by Govind Jha, 2015

लेखक- गोविन्द झा              
© स्वत्व- गोविन्द झा, 104, सती चित्रकूट अपार्टमेंट, गंगापथ, पटेलनगर (पष्चिम), पटना, 800023
प्रकाशनवर्ष- 2015 ई.
प्रथम संस्करण- 2015 ई.
प्रति- 300             
मूल्य- 70 (सत्तरि) टाका
ISBN 978.93.84394.16.6
प्रकाशक- साहित्यिकी, सरिसब-पाही, (मधुबनी), बिहार
आवरणशिल्प- राकेश कुमार
पुस्तक सज्जा- भवनाथ झा
मुद्रक- प्रकाश ऑफसेट, धरहरा कोठी, पटना
पुस्तकक मादे

‘‘सम्पूर्ण साहित्यकारक रूप मे गोविन्द बाबू कें चिन्ता छनि जे जनिका मिथिलाक कला, संस्कृति आ साहित्यक छूति नहिं ओ प्रतिनिधि बनबाक लौल करै छथि; एखनहुँ एहन लोक छथि जे बाबाक अमलदारी मे बान्हल हाथीक सिक्कड़ पँजियौने छथि; समाज मे झगड़ा पसारि अपन जीविका चलौनिहार रूदल काका के केना बाट ध्राओल जाएऋ स्वार्थ मे आन्हर मनुख केना गदहो सँ बत्तर भ गेल अछि; की वैवाहिक सम्बन्ध मात्र नियोक्ता आ नियुक्तक समझौता मात्रा थिक? गोविन्द बाबू समाजक विडम्बना कें देखैत छथि जे केना अज्ञात बच्चा तँ स्नेहभाजन बनैत अछि आ अपन घरक अविवाहिताक बच्चा डबरा मे फेकबाक वस्तु बनि जाइत अछि! एक दिस प्रजा भूखल-नाङट अछि आ दोसर दिस राजाक दरबारी सभ राजा कें ठकैत छथि जे प्रजा सुखी अछि। गामक स्कूल गहूमक वितरण-केन्द्र बनि गेल आ शहरक स्कूलक लोभ दए गामक बच्चा कें श्रमिक बनाओेल जा रहल अछि आ स्वप्नो मे नारी-मुक्तिक बाट केना बदरंग भए जाइत अछि- ई सभ टा रंग एतए नओ गोट एकांकीक रूप मे सोझाँ अबैत अछि। नाटककार गोविन्द बाबूक पूर्व-प्रकाशित रंगमंचोपयोगी एकांकीक संकलन थिक- नवरंग’’

लेखकक भूमिका

नेपथ्य सँ दू आखर
                ‘बसातबहुत दिन धरि गाम-गाम मे बहैत रहल परन्तु एको मंचन हम देखि नहि पओलहुँ। पहिल बेर देखल कलकत्ता मे, प्रकाशन सँ दस वर्ष पछाति। चेतना समिति हमर दू नाटक खेलाएल, परन्तु निर्देशक हमरा सँ काते रहलाह। दू-तीन बेर मंच पर उतरलहुँ आ असफलता मे प्रथम स्थान पाओल। शेखर जी उपदेश दैत रहलाह, जकरा मंचक अनुभव नहि, तकरा नाटक नहि लिखबाक चाही। जीवन मे कहिओ पटना सँ बाहर आधुनिक मंच नहि देखल। मैथिली मे प्रथा चलल, अपनहि लिखू, अपनहि मंच बनाउ, अपनहि निर्देशक बनू आ अपने टा नाटक देखाउ। ईहो काज हम कहिओ कए नहि सकलहुँ। एहनो स्थिति मे हम थेथरपनी करैत जे किछु लिखैत रहलहुँ तकरे किछु बचल-खुचल अंश थिक ई नवरंग।
-गोविन्द झा

Saat rekhaa saat rang [Seven essays on different topics in Maithili] by Govinda Jha

Book published under supervision of Pt. Bhavanath Jha, Book Publication Consultant.
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सात रेखा सात रंग

Saat  rekhaa  saat rang
[Seven essays on different topics in Maithili]
by Govinda Jha, 2015

लेखक- गोविन्द झा
मैथिली के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार पं. गोविन्द झा द्वारा मैथिली में लिखित सामाजिक इतिहास विषयक पुस्तक।
सात रेखा सात रंग (विविध विषयक सात निबन्ध)  
लेखक - गोविन्द झा
© स्वत्व - गोविन्द झा, 104, सती चित्रकूट अपार्टमेंट, गंगापथ, पटेलनगर (पश्चिम), पटना, 800023
प्रथम संस्करण- 2015 ई.
प्रति- 300
मूल्य -70 (सत्तरि) टाका
ISBN 978-93-84394-20-2
प्रकाशक- साहित्यिकी,  सरिसब-पाही, (मधुबनी), बिहार
आवरण शिल्प राकेश कुमार
पुस्तक सज्जा- भवनाथ झा
मुद्रक- प्रकाश आॅफसेट, धरहरा कोठी, पटना

पुस्तक के विषय में लेखक की भूमिकाः

प्रासंगिकी
  प्रस्तुत पुस्तक मे विभिन्न विषयक सात टा निबन्ध अछि। तें नाम ‘राखल सात रेखा सात रंग’। परन्तु ई सातो मिलि कें एके छवि अँकैत अछि- अपन गाम अपन लोक। एहि दुनूक सम्बन्ध मे जे किछु देखल, अनका सँ जानल आ पोथी-पतरा मे पढ़ल जेना-तेना खड़रि गेलहुँ। एकरा इतिहास नहि, मात्र संस्मरण बूझल जाए जे बुढ़ारी अवस्था मे अकट काल कटबाक लेल लिखैत गेलहुँ। अपना जनैत हम केवल तथ्य लिखल। ओकरा निन्दा कि प्रशंसा बूझब पाठकक मनोवृत्ति पर निर्भर अछि। हँ, तथ्य मे जे भ्रान्ति हो तकर दोषी हम। जे जन्मकाल मे सभ सँ पहिने हमरा छूलक आ जे हमर अन्तिम संस्कार लेल आगि देत सेहो ओहिना हमर अपन लोक जेना माता-पिता। खेद जे एहि मे अपन सभ लोक कें समुचित स्थान नहि दए सकलहुँ। कारण स्पष्ट अछि। अपना चलबा-फिरबाक सामथ्र्य नहि, आन केओ गौआँ संग देनिहार नहि। एहि असन्तुलनक एक कारण छल ऐतिहासिक स्रोतक दुर्लभता। सोचने रही जे एहि संस्मरण कें 2000 ई. धरि पहुँचाबी, परन्तु 1960 पहुँचैत-पहुँचैत थस लेलहुँ। ताहि सँ आगाँ पतिकरनी बूझू। तकरा बाद अपन गाम आ अपन लोक कोना-कोना अपना सन सँ अनका सन होइत गेल से आशा जे गामक केओ भावी सन्तान लिखत।
- गोविन्द झा

Thursday, August 6, 2015

Saroja-Sundar



सरोजसुन्दर
सरोजसुन्दरं नाम स्मृतिसारमिमं बुधाः।
सेवयन्तु सदा सन्ताः सर्वसन्देहशान्तये।1
क्षौरं तैलं जलञ्चोष्णमामिषं निशि भोजनम्।
रतिं स्नानं च मध्याह्ने रवौ सप्त विवर्जयेत्।।2।।
आमिषं निम्बकाष्ठानि तप्तवारिहरीतकी।
तैलमामलकीस्नानं वर्जयेद्रविवासरे।।3।।
आमिषं निम्बपत्राणि ऊष्णवारि तथा स्त्रियः।
सप्तजन्म भवेत् कुष्ठी भुक्त्वात्र रविवासरे।।4।।
प्रातःस्नाने पितुः श्राद्धे दशमीद्वादशीदिने।
तैलाभ्यङ्गेषु यत्तैलं तत्तैलं सुरया समम्।।5।।
अन्नं पानञ्च ताम्बूलं मैथुनं केशमार्जनम्।
द्यूतक्रीडा नृतं हास्यमेकादश्यां विवर्जयेत्।।6।।
असकृज्जलपानाच्च सकृत्ताम्बूलभक्षणात्।
उपवासः प्रणष्टः स्यात् दिवास्वापाच्च मैथुनात्।।7।।
तैलस्त्रीमधुमांसानि परान्नं कांस्यभोजनम्।
पुनर्भुक्तं दिवास्वापं द्वादश्यां परिवर्जयेत्।।8।।
गङ्गा विप्रः कुशो वह्निःतुलसी शङ्खभाजनम्।
अनिर्माल्यानि चैतानि क्रियमाणानि चासकृत्।।9।।
गङ्गोदकेन्यत्पतितं तत्तोयं मदिरासमम्।
तन्मध्ये पतितं यत्तु वर्जनीयं प्रयत्नतः।।10।।
गङ्गायाः उज्झितं तोयं पुनर्गङ्गां न गच्छति।
तज्जलं सुरया तुल्यं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्।।11।।
प्रतश्राद्धेषु भुञ्जाना ये विप्रा ग्रामयाचकाः।
रसविक्रयिणो ये च वर्जनीया विशेषतः।।12।।
श्राद्धरम्भे विसर्गे च विकिरे पिण्डिकासने।
प्रक्षव्ये-------दल्पे च षट्सु चावमनं स्मृतम्।।13।।
पिण्डासने च ये दर्भाः ये दर्भाः पितृतर्पणे।
विकिरेषु च ये दर्भाः वर्जनीया विशेषतः।।14।।
अमाश्राद्धं गयाश्राद्धं श्राद्धं वापरपाक्षिकम्।
----नाब्दिकं नरः कुर्यात् सद्यः किल्बिषभाग्भवेत्।।15।।
आहारं मैथुनं निद्रां सन्ध्याकाले विवर्जयेत्।
कर्म चाप्यध्ययनं वापि तथा दानप्रतिग्रहौ।।16।।
शुष्कमांसं स्त्रियो वृद्धा बालार्कस्तरुणं दधि।
प्रभाते मैथुनं निद्रा सद्यः प्राणहराणि षट्।।17।।
सद्योमांसं स्त्रियो बाला नवान्नं क्षीरभोजनम्।
घृतमूष्णोदकञ्चैव सद्यः प्राणकराणि षट्।।18।।
अपत्नीकः प्रवासी च यस्य भार्या रजस्वला।
आमश्राद्धं द्विजो दद्याच्छूद्रो तत्तु सदैव हि।।19।।
उद्धृत्य पङ्कलग्नां गां ब्राह्मणं रोगपीडितम्।
उद्धरेत् सप्त गोत्राणि स्वयं गच्छेत् परं पदम्।।20।।
पुष्पहस्ते पयोहस्ते तैलाभ्यङ्गे जले तथा।
आशीःकुर्वन् नमस्कुर्वन्नुभौ नरकगामिनौ।।21।।
जपन्तं जलमध्यस्थं दूरस्थं धनगर्वितम्।
रोगाक्रान्तं मदोन्मत्तं षड् विप्रान् नाभिवादयेत्।।22।।
अप्रणामे कृते शूद्रे स्वस्ति कुर्वन्ति य. नराः।
शूद्राश्च नरकं यान्ति ब्राह्मणास्तदनन्तरम्।।23।।
वृद्धा गाश्च रजःकन्या ब्राह्मणस्य कुभोजनम्।
जीर्णवस्त्रञ्च यो दद्यात् स दाता नरकं व्रजेत्।।24।।
जलदः सुखमाप्नोति श्रियमाप्नोति चान्नदः।
भूमिदो भूमिपालश्च श्रीमाँस्ताम्बूलदो भवेत्।।25।।
यज्ञोपवीतं व्यजनं छत्रोपानहमेव च।
स्वस्य दानेन कौन्तेय पुण्यसंख्या न विद्यते।।26।।
शालग्रामशिलां कन्यां धेनुं पृथ्वीं सरस्वतीम्।
यो दद्यात् स व्रजेत् स्वर्गं प्रतिग्राही तथैव च।।27।।
मांसविक्रयणं नृणां सद्यो गोमांसभक्षणम्।
न तु भागीरथीतीरे प्रतिग्राही भवेन्नरः।।28।।
शनिभौमदिने श्राद्धे कुहू षष्ठी निरंशके।
वस्त्राणां क्षारसंयोगो दहत्यासप्तमं कुलम्।।29।।
केशश्मश्रुनखाग्रेण यत्तोयं वामपाणिना।
तिष्ठन् हि रजकस्थानं तच्चोक्तं सुरया समम्।।30।।
पादेन घटमुत्थाप्य भाजने क्रियते यदि।
तज्जलं सुरया तुल्यं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति।।31।।
आसने पादमाक्रम्य विवस्त्रकृतभोजनम्।
अभक्ष्यं तद्भवेदन्नं सद्यो गोमांसभक्षणम्।।32।।
करे कर्पटके चैव पाषाणे ताम्रभाजने।
अश्वत्थवटपत्रेषु भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।।33।।
आसनं वसनं शय्या जायापत्यं कमण्डलुः।
शुचीन्यात्मन एतानि न परेषां कदाचन।।34।।
आसनं वसनं यानं परिपन्थास्तृणानि च।
मारुतार्केण शुद्ध्यन्ति पक्वेष्टकचितानि च।।35।।
संमार्जनीरजो नाशं निर्गन्तालकुचं तथा।
रात्रौ बिल्वपलाशञ्च कपित्थं वर्जयेत् सदा।।36।।
स्नानं सन्ध्या जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम्।
वैश्वदेवं तथातिथ्यं नवमं पितृतर्पणम्।।37।।
विना दर्भेण या सन्ध्या यच्च दानं विनोदकैः।
असंख्यातन्तु यज्जप्तं तत्सर्वं निःफलं भवेत्।।38।।
अजा गावो महिष्यश्च ब्राह्मणी च प्रसूतिका।
दशरात्रेण शुद्ध्यन्ति भूमिष्ठञ्चाविनोदकम्।।39।।
वत्सः प्रस्रवणे मेध्यः शकुनिः फलपातने।
स्त्रीमुखं रतिसंसर्गे शिवामृगग्रहणे शुचिः।।40।।
मक्षिका पिप्पली नारी भूमितोयं हुताशनः।
मार्जारी मुशली चैव आखुकश्च सदा शुचिः।।41।।
विदाक्षरविचारेण ब्राह्मणीगमनेन च।
कपिलाक्षीरपानेन त्रिभिः शूद्रो विनश्यति।।42।।
प्रथमे प्रहरे तोयं देयं पुत्रैः सुधोपमम्।
द्वितीये तु पयस्तुल्यं तृतीये जलमुच्यते।।43।।
चतुर्थे विषतुल्यं स्यादतः प्रातः समाचरेत्।
एकादशीव्रतं प्राप्य पितुः संवत्सरं भवेत्।
भार्या ऋतुमती चैव कथं धर्मः प्रवर्तते।।44।।
श्राद्धं कृत्वा व्रतं कुर्यात् पिण्डघ्राणं ततः स्मृतम्।
रात्रेश्चतुर्थभागे तु ऋतुदानं प्रवर्तते।।45।।
पलाण्डु विड्वराहञ्च छत्राकं ग्राम्यकुक्कुटम्।
लशुनं गृञ्जनञ्चैव जग्ध्वा चान्द्रायणञ्चरेत्।।47।।
पण्डितस्यापि शूद्रस्य शास्त्रज्ञानरतस्य च।
न तस्य वचनं ग्राह्यं श्वालीढञ्च हविर्यथा।।48।।
जलपात्रं करे धृत्वा मूलोच्चारं करोति यः।
तत्पात्रस्थजलं यच्च सुराधिकसमं भवेत्।।49।।
आयसेषु च पात्रेषु यदन्नमुपनीयते।
भुक्त्वा विष्ठासमं तच्च दाता च नरकं व्रजेत्।।50।।
पीठके पादमारोप्य यो भुङ्क्ते पुरुषाधमः।
अभक्ष्यं तद्भवेदन्नं सद्यो गो मांसभक्षणम्।।51।।
विना धौतेन पादेन स्नात्वा विशति मन्दिरम्।
संवत्सरकृतं पुण्यं तत्क्षणादेव नश्यति।।52।।
रजकं चर्मकारं च ध्वजिनं चक्रिणं तथा।
गणिकाञ्च खरं स्पृष्ट्वा सचैलो जलमाविशेत्।।53।।
स्नानं रजकतीर्थेषु भोजनं गणिकागृहे।
पश्चिमोत्तरशायी च हन्ति पुण्यं पुरा कृतम्।।54।।
घृतं तैलं दधि क्षीरं तथा तक्रं गुडं मधु।
शूद्रभाण्डस्थितं वापि ग्राह्यमेतत् सदैव हि।।55।।
पादप्रोक्षं मूलशेषं सन्ध्याशेषञ्च यज्जलम्।
तज्जलं सुरया तुल्यं भूमौ निक्षेपणं विना।।56।।
न शङ्खेन पिबेत् तोयं न भक्षेत् कूर्मशूकरौ।
न वदेद्यावनीं वाणीं प्राणै कण्ठगतैरपि।।57।।
अलाबू वर्तुलाकारा वार्ताकी श्वेतवर्णिकाम्।
प्राणान्तेपि च नाश्नीयात् मसूरान्नं सवल्कलम्।।58।।
पीतोच्छिष्टं पदोच्छिष्टमात्मोच्छिष्टन्तथैव च।
तज्जलं सुरया तुल्यं भूमौ निक्षेपणं विना।।59।।
अग्रतो देवताः सर्वाः पृष्ठतो मुनयस्तथा।
दक्षिणे पितरः सर्वे वामे गण्डूषमुत्सृजेत्।।60।।
प्रातःस्नाने पितुःश्राद्धे ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।
सुरालेपसमं तैलमुपवासे च पारणे।।61।।
माता चैव पिता चैव ज्येष्ठभ्राता तथैव च।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्।।62।।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे कन्यां यो न प्रयच्छति।
मासि मासि रजस्तस्याः पिता पिबति शोणितम्।।63।।
अपत्यविक्रयं कृत्वा वंशं विक्रीय भोजनम्।
तस्मान्न क्वापि कन्यायाः उपजीवेत् पिता धनम्।।64।।
पतितं हि कुलं तस्य मातृकं पैतृकं तथा।
तन्देशं पतितं मन्ये यत्रास्ति सुतविक्रयी।।65।।
मेरुमन्दरतुल्यं हि यत्पापं समुपार्जितम्।
हरिद्याक्षी दहेत्सर्वं न कन्यासुतविक्रयम्।।66।।
अतिप्रौढतरा कन्या कुले धर्मविरोधिनी।
अशुद्धेपि च सा देया चन्द्रतारानुकूलके।।67।।
अमाश्राद्धं गयाश्राद्धं श्राद्धञ्चापरपाक्षिकम्।
न जीवत्पितृकः कुर्यात् पितृहा चोपजायते।।68।।
न बाहौ तिलकं कुर्यात् ज्येष्ठे भ्रातरि जीवति।
आयुः संहरते भ्रातुः कर्ता च नरकं व्रजेत्।।69।।
ललाटे ज्योतिषाकारं बाह्वोस्तु वंशपत्रवत्।
हृदयेश्वत्थपत्राभं सर्वाङ्गे तुलसीदलम्।।70।।
कर्मनाशाजलस्पर्शात् करतोयाविलङ्घनात्।
गण्डकीबाहुतरणात् हन्ति पुण्यं पुरा कृतम्।।71।।
कर्णे पुष्पं कटौ सूत्रं वेणीं शिरसि धारयेत्।
तावन्नटस्तु चाण्डालो यावद्गङ्गान्न गच्छति।।72।।
कूपान्तर्गतवल्मीकमूषिकोत्खातवर्त्मनः।
गेहाद् वा जलमध्यस्थान्मृदा शौचं न कारयेत्।।73।।
विना काष्ठेन लौहेन उद्धृता या सुमृत्तिका।
यैः कृतन्तु तया शौचं विष्ठालेपसमं भवेत्।।74।।
संक्रान्तौ पक्षयोरन्ते द्वादश्यां रात्रिसन्ध्ययोः।
तुलसीं ये विचिन्वन्ति ते छिन्दन्ति हरेः शिरः।।75।।
यो दद्यात् समगोत्राणां कन्यां धेनु स्ववर्णकम्।
दाता च श्वानतुल्यो हि जायते नात्र संशयः।।76।।
चर्मकारी नटी वेश्या म्लेच्छस्त्री रजकी तथा।
-----ञ्च गमनं कृत्वा चरेच्चान्द्रायणं व्रतम्।।77।।
कुण्डे च मण्डपे तीर्थे नौकायां गजपृष्ठके।
तृणाच्छादितभूमौ च स्पर्शदोषो न विद्यते।।78।।
गुर्वादित्ये गुरौ सिंहे नष्टे शुक्रे मलिम्लुचे।
याम्यायने हरौ सप्ते शुभं कर्म विवर्जयेत्।।79।।
तीर्थे विवाहे यात्रायां सङ्ग्रामे देशविप्लवे।
नगरग्रामदाहे च स्पर्शदोषो न विद्यते।।80।।
पद्यमूत्रपुरीषाणामीक्षणे नास्ति कश्चन।
दोषो बाले पञ्चवर्षे तच्च पित्रोः सुहृद्गुरोः।।81।।
गयायां पिष्डदानेन जिवितस्य पितुर्वचः।
त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रत्वं क्षयाहे भूरि भोजनैः।।82।।
स्नानं कृत्वा द्विजः कश्चित् पुष्पं त्रोटयते यदि।
देवतास्तन्न गृह्णन्ति पूजा भवति निष्फला।83।।
विधवानाञ्च नारीणां यतीनां ब्रह्मचारिणाम्।
चतुर्भिरामिषं ज्ञेयं ताम्बूलादिचतुष्टयम्।।84।।
शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कं शूद्रेणैव सहासनम्।
शूद्राद्धनागमः कश्चित् स्वर्गस्थमपि पातयेत्।।85।।
आममांसं घृतं क्षौद्रं स्नेहाश्च फलसम्भवाः।
म्लेच्छभाण्डस्थितादूष्णा निष्क्रान्ताः शुचयः स्मृताः।।86।।
आमिषं मत्स्यमांसानि रामठञ्चामिषं विदुः।
एकैकमामिषं ज्ञेयं ताम्बूलादिचतुष्टयम्।।87।।
विधवानाञ्च नारीणां दण्डिनां ब्रह्मचारिणाम्।
सुगन्धिलेपनं तैलं यत्नतः परिवर्जयेत्।।88।।
गोमूत्रञ्च गवां क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्।
अतिपूतसमं प्रोक्तं महापातकनाशनम्।।89।।
पञ्चगव्यं पिबेद् विप्रः क्षत्रः शिरसि धारयेत्।
वैश्यश्च मार्जनं गात्रे शूद्रः शुद्धश्च दर्शनात्।।90।।
अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियस्य मधु स्मृतम्।
दुग्धतुल्यञ्च वैश्यस्य शूद्रस्य रुधिरोपमम्।।91।।
न पातयेदिष्टकाभिः फलानि तु फलेन वा।
न म्लेच्छभाषां शिक्षेत नाकर्षेच्च पदासनम्।।92।।
करैः प्रोक्षति गात्राणि स्नानवस्त्रेण वा पुनः।
श्वानोच्छिष्टसमं गात्रं पुनःस्नानेन शुद्ध्यति।।93।।
विना धौतेन वस्त्रेण भुञ्जीत ब्राह्मणो यदि।
देवानां पूजनञ्चैव भस्मीभवति काष्ठवत्।।94।।
तैलाभ्यङ्गे चिताधूमे क्षौरे च मैथुने तथा।
तावद्भवति चाण्डालो यावत्स्नानं न चाचरेत्।।95।।
कूष्माण्डच्छेदिका नारी दीपनिर्वापकः पुमान्।
अचिरेणैव कालेन वंशच्छेदो भविष्यति।।96।।
अजारजः खररजस्तथा सम्मार्जनीरजः।
रजस्त्रियो हि कौन्तेय हन्ति पुण्यं पुराकृतम्।।97।।
स्वेदस्तम्भोथ रोमाञ्चः स्वरभङ्गोथ वेपथुः।
वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्विकाः स्मृताः।।98।।
तीर्थेषु-------------पापं चिकुरे मृतसूतके।
सूतिका------------पापमन्नादो हरिवासरे।।99।।
इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम्।
भक्षयित्वापि कर्तव्या स्नानदानादिकाः क्रियाः।।100।।
विनोदकेन यत्पक्वं यत्पक्वं लवणं विना।
तत्पक्वं फलवद् ग्राह्यं पाकदोषो न विद्यते।।101।।
प्राक्शिरः शयने विद्या कीर्तिरायुश्च दक्षिणे।
पश्चिमे प्रबला चिन्ता हानिमृत्यू तथोत्तरे।।102।।
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिमन्यते।
स चाण्डालसमो ज्ञेयो मृते श्वत्वमवाप्नुयात्।।103।।
मूत्रे पुरीषे भुक्तान्ते वीर्योत्सर्गे तथैव च।
चतुर्द्वादशषोडशकै गण्डूषैः शुद्धिमाप्नुयात्।।104।।
मृण्मये गोमये वापि लतापाषाणभूतले।
अग्निदग्धे लौहपात्रे आसनानि विवर्जयेत्।।105।।
त्यजेत् पर्युषितं पुष्पं त्यजेत् पर्युषितं जलम्।
न त्यजेज्जाह्नवीतोयं तुलसी बिल्वपङ्कजम्।।106।।
तुलसी दशरात्रेण षण्मासान् व्याप्य बिल्वजम्।
पङ्कजं सप्तरात्रेण न सङ्ख्या जाह्नवीजले।।107।।
नापितस्यगृहे क्षौरं शिलापृष्ठेषु चन्दनम्।
जलमध्ये मुखं दृष्ट्वा हन्ति पुण्यं पुरा कृतम्।।108।।
भोजनं ताम्रपात्रेषु जलपात्रञ्च नामतः।
ग्रासे ग्रासे मलं भुङ्क्ते तज्जलं मदिरासमम्।।109।।

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